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  वरिष्ठ साहित्य कार सदाशिव कौतुक जी की आत्म कथा ‘ जितना मुझे याद रहा ’ मेरी नजर से ....... भाग (‌ 2 )   कौतुक जी ने अपनी आत्म कथा के प्रथम अध्याय के माध्यम में अपनी प्यारी जन्म भूमि गौगावां जिला खरगौन की भोगोलिक स्थिति , खेत , खलिहान , गलियों , बाजार , चौक , नदी , नालों से पाठकों का परिचय करवाया। पर उनकी नजर में जन्म भूमि केवल गांव की जमीन जायजाद या मील के पत्थर पर लिखा निर्जीव नाम मात्र नहीं है। उनके लिये जन्मभूमि की परिभाषा में वहां बसे जीवित इंसान , उनकी जातियां , जीवन शैली , रीति-रिवाज , काम-काज , आजीविका के साधन , आचार व्यवहार , सामाजिक , जातिगत तथा व्यक्तिगत खूबियों आदि का विस्तृत वर्णन किया है। अध्याय में छुआछूत जैसी बुराईयों के साथ एक दूजे की मदद करने का जज्बे को भी समेटा है। वहीं दवाईयों के अभाव में झाड़ फूंक द्वारा सर्प दंश के सफलता पूर्वक उतारे जाने का भी जिक्र है। नाटक है , स्वांग के माध्यम हंसी ठिठोली है , तत्कालीन खान-पान है।      इस अभिनव आत्म कथा को जब में पढ़ रहा हूं तो मन में मेरी स्वयं की आत्म कथा और जीवन का संघर्ष भ...

वरिष्ठ साहित्य कार सदाशिव कौतुक जी की आत्म कथा ‘ जितना मुझे याद रहा’

  वरिष्ठ साहित्य कार सदाशिव कौतुक जी की आत्म कथा ‘ जितना मुझे याद रहा ’ मेरी नजर से ....... भाग (‌1) आजकल मेरी आंखे इंदौर के वरिष्ठ कवि सदाशिव कौतुक जी की आत्मकथा “ जितना मुझे याद  रहा ” के पन्नों पर भ्रमण कर रही है। अपने जीवन के बीते वर्षो‌ नहीं बल्कि पल पल के अनुभवों और यादों को उन्होंने अपनी इस 251 प्रष्ठों की पुस्तक में बड़ी ही खूबसूरती तथा बारीकी के साथ सांझा किया है। मुझे लगता है कि पुस्तक का शीर्षक जितना के स्थान पर “ कितना कुछ मुझे याद रहा ” होना चाहिये। कौतुक जी से यूं तो अनेकों साहित्यिक आयोजनों में सामना ( इसे मिलना नहीं कहा जा सकता) हुआ। सही मायनों में मिलना तब हुआ जब मैं जनवरी 22 के दूसरे पखवाड़े में अपने प्रथम काव्य संकलन ‘ ठेला ’ की एक प्रति उन्हें भेंट करने के लिये उनके निवास पर पहुंचा। पुस्तक उन्हें दिल से पसंद आई और उन्होंने बिना किसी अनुरोध के चंद दिनों में मेरी पुस्तक की हस्त लिखित समीक्षा मुझे भेज दी तथा मुझे तथा मेरे ठेले को खुशियों से सराबोर कर दिया। उस आत्मीय मुलाकात में चाय के साथ चर्चा में उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष के बारे में संक्षेप मे...