वरिष्ठ साहित्य कार सदाशिव कौतुक जी की आत्म कथा जितना मुझे याद रहा

मेरी नजर से ....... भाग (‌2)

 

कौतुक जी ने अपनी आत्म कथा के प्रथम अध्याय के माध्यम में अपनी प्यारी जन्म भूमि गौगावां जिला खरगौन की भोगोलिक स्थिति, खेत, खलिहान, गलियों, बाजार, चौक, नदी, नालों से पाठकों का परिचय करवाया। पर उनकी नजर में जन्म भूमि केवल गांव की जमीन जायजाद या मील के पत्थर पर लिखा निर्जीव नाम मात्र नहीं है। उनके लिये जन्मभूमि की परिभाषा में वहां बसे जीवित इंसान, उनकी जातियां, जीवन शैली, रीति-रिवाज, काम-काज, आजीविका के साधन, आचार व्यवहार, सामाजिक, जातिगत तथा व्यक्तिगत खूबियों आदि का विस्तृत वर्णन किया है। अध्याय में छुआछूत जैसी बुराईयों के साथ एक दूजे की मदद करने का जज्बे को भी समेटा है। वहीं दवाईयों के अभाव में झाड़ फूंक द्वारा सर्प दंश के सफलता पूर्वक उतारे जाने का भी जिक्र है। नाटक है, स्वांग के माध्यम हंसी ठिठोली है, तत्कालीन खान-पान है।   

 

इस अभिनव आत्म कथा को जब में पढ़ रहा हूं तो मन में मेरी स्वयं की आत्म कथा और जीवन का संघर्ष भी उमड़ता घुमड़ता साथ बह रहा है। आत्मकथा के अध्याय दो में कौतुकजी  की लेखनी का कौतुक हमें उनकी जन्मभूमि की एक इकाई यानि उनके आशियाँ की और ले चलती है। मेरा आशियाँ शीर्षक के इस अध्याय में कौतुक जी अपने छः चश्मे के गारे फूस के बने मकान , गोबर से लिपी जमीन व दीवारें, लकड़ी की तिपाई पर रखी गोदड़ियां ( गादी‌-रजाई) आंगन में रखा मटका तथा रात्रि को आड़ी टेड़ी लकड़ियों से बंद प्रवेश द्वार का जिक्र करते हैं। जाहिर है वहां दरवाजे नाम की चीज नहीं थी। उनके शब्दों में चोरी जाने लायक कुछ था भी नहीं। शौच निवृति नदी भुनसारे ( अल सुबह)  नदी किनारे जाकर होती थी। मेरा बचपन भीकनगाँव , कोलारस, कन्नोद आदि में बीता। गाँव की मिट्टी तथा हवा की खुशबू से वही आंदोलित हो सकता है जिसने वहाँ एक अर्सा बिताया हो। अभाव होते हुए भी गाँव में कुछ ऐसी बात होती है जो व्यक्ति को अपने पुरुखों के गाँव की यादों के समंदर में डुबने पर विवश कर देती है। कौतुक जी की यही विवशता उन्हें अपने आशियां से जोड़ती है।  

कौतुक जी के बचपन के घर के वर्णन और उनकी आज की स्थिति को देखकर मन में यही विचार आता है कि गारे फूस के मकान को देखकर उसमें रह रहे किसी इंसान की ताकत का अंदाजा मत लगाना । पुस्तक को पढ़ने में आनंद इसलिये आ रहा है कि स्वयं की आत्म कथा भी साथ चल रही है। इंसानी दिल केवल शरीर की बाईं और ही नहीं बल्कि बचपन के आशियाने में भी बसता है। पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या नहीं पर जब भी मेरे सपनों में घर आता है तो वह 60 के दशक का मेरे बचपन का घर होता है आज का आधुनिक वा सज्जित घर नहीं । मेरा अवचेतन मन उसे खाली करने के लिये तैयार ही नहीं है।         

कौतुक जी लिखते हैं कि वह जमाना सस्ता था। अन्य विलासिता के कोई साधन नहीं होते थे। एक व्यक्ति कमाता दस का पेट भर जाता था। दू जून की रोटी में संसार समाया हुआ था। दो वक्त की रोटी, प्रेम भाव और चैन की नींद की आकुलता थी। आज का दिन अच्छा निकल जाए कल का कल देखने की सोच थी। जीवन में संघर्ष ही संघर्ष था। उनकी दादी 90 वर्ष की होने के बावजूद पगड़ी की बुनाई करती थी। दादाजी भी यही काम करते थे। उस जमाने में पगड़ी बांधने का बहुत चलन था। इसलिये किसी समय दादाजी के पास इतना पैसा था कि उन्होंने कौतुक जी के पिता की शादी बीस दिनों तक मांडी। पैसा था पर दूरदृष्टि नहीं थी। ज्ञान नहीं था कि समय भी करवट बदलता है। और समय ने करवट बदल कर संघर्ष की स्थिति में ला खड़ा किया। कौतुक जी के चाचा की तीन शादियों के खर्च ने भी जमा पूंजी को साफ कर दिया। यानि शादी ब्याह में दिखावा और बेतहाशा खर्च आज ही नहीं दशकों से देश की रीत है। अदूरदर्शिता का तांडव आज भी जारी है।

कौतुक जी ने अपने परिवार के संघर्ष के दिनों की गाथा की नायिका अपनी दादी रूपाबाई को बताते हुए उन्हें श्रम की देवी जैसे अनूठे विशेषण से नवाजा है। यह कोई संयोग नहीं कि उनके इंदौर स्थित मकान का नाम भी श्रमफल है। उनके बारे में कौतुक जी लिखते हैं कि दादी त्योंहारों पर भी विश्राम नहीं करती थी माह के तीसों दिन खेतों पर बस काम ही काम। उन्हें न खाने के स्वाद में रुचि ना अच्छे कपड़े पहनने में। बारहों महीने सूरज जैसा क्रम रहता। ना भजन, ना पूजन, ना गपशप, न उत्सव की खुशी और ना पल्लू में पैसे का मोह। त्योंहार के दिन कभी घर रह भी जाती तो उस दिन भी घर की लिपाई, ओटला बनाई, छबाई करती या जंगल में लकड़ियां लेने चली जाती।

कौतुक जी ने जब लिख दिया कि बारहों महीने सूरज जैसा क्रम तो फिर उसमें दादीजी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व झलक गया। उक्त वर्णन से प्रतीत होता है वे सच्चे अर्थ में निष्काम कर्म योगिनी थी। एक संत थी। आजादी पूर्व तथा बाद की परिस्थितियों का सही अध्ययन करें तो तत्कालीन परिवारों में स्त्रियों की स्थिति तकरीबन ऐसी ही थी।

चलते चलते एक बात का जिक्र करना उचित होगा। महू के एक इतिहासकार डेंजिल लोबो ने हमारे सांघी परिवार के 110 वर्षों के इतिहास को एक पुस्तक “ THE SANGHIS OF SANGHI STREET MHOW”  में संजोया है। यह पुस्तक आने वाली कई पीढियों तक परिवार की जानकारी वा गौरव गाथा सुनाती रहेगी। इस पुस्तक की एक कमी यह है कि दादा व परदादाऑ के परिचय व उपलब्धियों की विस्तृत वा सचित्र जानकारी इसमें है पर महिलाओं के बारे में बेहद अल्प जानकारी है। मेरे पास अपने परदादाजी की अंग्रेजी में हस्त लिखित 1893 से 1896 तक की डायरी है उसमें परदादी जी का बीमारी से संघर्ष तथा असमय मृत्यु  का मर्मांतक चित्रण है पर उनका नाम नहीं हैं। महिलाओं को नाम से जानने की उस समय शायद प्रथा ही नहीं थी। कौतुक जी ने अपनी परदादी जी का नाम बोंदरबाई बताया। अपने परिवार की जिस साधन विहीन ग्राम्य प्रष्टभूमि का जिक्र उन्होंने किया उसमें परदादी का नाम याद होना तथा 90 वर्ष की आयु में पगड़ी बुनने की जानकारी होना बडी, बहुत बड़ी बात है।  

पुस्तक में कौतुक जी ने अपने दादाजी तथा उनके साथियों की भजन मंडली का जिक्र किया है जो हर सोमवार तथा मंगल प्रसंग में बुलाए जाने पर ढोलक, खंजरी, हार्मोनियमऔर झांझ के साथ रात रात भर दो चाय की ताकत के सहारे भजन करती थी। कहने की जरूरत नहीं ऐसी ही भजन मंडलियों के कारण देश में धार्मिक भावना तथा जाग्रति जिंदा है।

डीजल से चलने वाली छुक छुक आवाज करती आटा चक्की के साथ जमीन वाली तीसरी श्रेणी से लेकर मुड्डे वाली विशेष श्रेणी वाला शिव शंकर टाकीज तथा मुँहपर भोंगा लगा कर फिल्म का प्रचार और पीछे लगी बच्चों की टुल्लर का जिक्र तत्कालीन मनोरंजन व्यवसाय की झलक को संजोता है। पुस्तक में पशु मेले का उल्लेख है। पशु किसानों का मह्त्वपूर्ण धन माना जाता था।

किसानों की सम्पन्नता से जलने वालों लोगों का उल्लेख आश्चर्य से भर देता है जो रात को उनके खेतों मे आग लगा दिया करते थे। हर देश काल में कोई ना कोई उद्दारक तथा सम्बल देने वाला होता है। अपनी कमाई लुट जाने से आहत ऐसे लोग संत सिंगाजी का नाम लेकर फिर से काम में लग जाते थे। खंडवा जिले के गांव सिंगाजी में 491 वर्ष पूर्व जन्में संत सिंगाजी की समाधी स्थल है। उनके प्रति जनता की आस्था का विस्तृत विवरण अध्याय में है। 

अध्याय के अंत में तत्कालीन महिलाओं की स्थिति का विवरण है, जिन्हें हमेशा घूंघट में रहना होता था, जिनके पास चूल्हे चोके, पशु तथा खेत खलिहान का ध्यान रखने के अलावा कोई अधिकार नहीं थे। प्रसूतियां अक्सर धर पर दाईयों के द्वारा होती थी। धर से निकलते समय राह में कोई बड़ा बुजुर्ग सामने आ जाए तो उसे छुई मुई सा दीवार की और मुहँ फेरकर खडी होकर उन्हें सम्मान देना होता था। बेटा अपनी संतान को वर्षों अपनी माता पिता के समक्ष गोद में नहीं उठा सकता था, उसे प्यार नहीं कर सकता था। ऐसे कुछ नियम मैंए अपने पिताजी से भी सुने थे जो महू में भी प्रचलित थे। आने वाली पीढियों तथा शोशार्धियों को यह किताब ऐसे कई नियमों की जानकारी देती रहेगी।

अंत में तब पगडी को पहनना तथा पहनाना बड़े सम्मान की बात होती थी। पर पगड़ी की बिक्री कम हो चली थी जिसने कौतुक जी के परिवार की आर्थिक परेशानियां बढ़ा दी थी। शायद यह टोपी पहनाने के युग की शुरुआत थी।

 

महेंद्र सांघी दद्दू

भाग 3 जल्दी ही...................

 

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