वरिष्ठ साहित्य कार सदाशिव कौतुक जी की आत्म कथा ‘ जितना मुझे याद रहा’
वरिष्ठ साहित्य कार सदाशिव कौतुक जी की आत्म कथा ‘ जितना मुझे याद रहा’
मेरी नजर से ....... भाग (1)
आजकल मेरी आंखे इंदौर के वरिष्ठ कवि सदाशिव कौतुक जी की आत्मकथा “जितना मुझे याद रहा” के पन्नों पर भ्रमण कर रही है। अपने जीवन के बीते वर्षो नहीं बल्कि पल पल के अनुभवों और यादों को उन्होंने अपनी इस 251 प्रष्ठों की पुस्तक में बड़ी ही खूबसूरती तथा बारीकी के साथ सांझा किया है। मुझे लगता है कि पुस्तक का शीर्षक जितना के स्थान पर “ कितना कुछ मुझे याद रहा” होना चाहिये।
कौतुक जी से यूं तो अनेकों साहित्यिक आयोजनों में सामना ( इसे मिलना नहीं कहा जा सकता) हुआ। सही मायनों में मिलना तब हुआ जब मैं जनवरी 22 के दूसरे पखवाड़े में अपने प्रथम काव्य संकलन ‘ठेला’ की एक प्रति उन्हें भेंट करने के लिये उनके निवास पर पहुंचा। पुस्तक उन्हें दिल से पसंद आई और उन्होंने बिना किसी अनुरोध के चंद दिनों में मेरी पुस्तक की हस्त लिखित समीक्षा मुझे भेज दी तथा मुझे तथा मेरे ठेले को खुशियों से सराबोर कर दिया।
उस आत्मीय मुलाकात में चाय के साथ चर्चा में उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष के बारे में संक्षेप में बताया। साथ ही अपनी आत्म कथा की पुस्तक “ जितना मुझे याद रहा “ इस शर्त के साथ भेंट की कि इस पढ़कर वापस करना होगा क्योंकि बहुत कम प्रतियां शेष हैं।
पुस्तक 'जितना मुझे याद रहा' को बांचने का श्रीगणेश 22 जनवरी 22 से किया। आत्मकथ्य ने ही मुझे विस्मित, अभिभूत तथा मंत्र मुग्ध कर दिया। जब आगाज़ ऐसा है तो पुस्तक उत्कृष्ट विचारों वा अनुभवों की खान जरूर होगी।
पुस्तक के नाम का चुनाव लाजवाब है। पुस्तक के कवर पेज पर कौतुक जी के चित्र के पीछे एक और छायाचित्र की उपस्थिति उनके मन की यादों को प्रतिबिंबित करती है। बहुत ही उम्दा छायाचित्र है।
अपने आत्मकथ्य में अपने संघर्ष की गाथा की भूमिका रचते हुए वे कहते हैं कि “ समय ना रुकता है, न लौट कर आता है। समय हमारी परीक्षा भी लेता है। यदि हम समय को नजरअंदाज कर जाते हैं तो बाद में समय हमारी हंसी उड़ाता है। हमारी पदचाप के पल पल की आहट समय के खाते में दर्ज होती है। समय विराट और असीमित है। समय प्रकृति है, समय ईश्वर है जिसे हमारे आने वाले पल का भी पता है और घटित होने वाली घटना का भी।
1990 के दशक की बात थी जब मैं अपने साहित्यकार जीजाजी जवाहर लाल गर्ग के साथ कार में एक साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने खंडवा जा रहा था। साथ में एक और साहित्यकार मित्र थे जिन्होंने रास्ते में पुरजोर तरीके से अपने तर्कों से बताया कि समय ही ईश्वर की परिभाषा पर खरा उतरता है। उनका यह तर्क मुझे वर्षों तक याद रहा। आत्म कथ्य में इसका जिक्र पाकर मैंने जीजाजी से पूछा और जाना कि उस दिन कार में साथ में सदाशिव जी ही थे। यानि मिलना 90 के दशक में हो चुका था।
अपने कथ्य में वे यह भी लिखते हैं कि स्थिर निष्ठा से अपना जीवन रचने के बाद उन्हें श्रम साध्य रोटी मिली, सुविधा भी मिली परंतु सच्चाई बहुत कम लोगों में मिली। स्वार्थ मिला वह भी सीमा से अधिक। यह विडम्बना तथा विसंगति आज भी यथावत है। शायद समाज में मूल्यों के विघटन का यह भी एक कारण है। साहित्य को उन्होंने आंतरिक जरूरत भी बताया और साथ ही घाटे का कारोबार भी।
समाज को सोचना चाहिये कि क्यों साहित्य घाटे का कारोबार है। दुनिया जितना विज्ञान और उसके द्वारा प्रदत्त भोग विलास के साधन सुविधाओं की मृगमरीचिका के पीछे भाग रही है उतना जी साहित्य सृजन से दूर होती जा रही है जो समाज को दिशा देने का काम करता है। किसी साहित्यकार के सृजन पर नजर डालने, यदि किसी अखबार की सीमित आरक्षित जगह पर उसे जगह मिल पाई तो, के स्थान पर लोगों की रुचि हत्या, बलात्कार, धोखे, घॉटाले, बंद, धरने, दंगे, तोड़फोड़ आदि से सम्बंधित खबरों को बांचने पर अधिक होती है जैसे वह अनुकरणीय कार्य हों। क्या यह एक बीमारू मानसिकता नहीं है। स्थिति तब अधिक गम्भीर हो जाती है जब आजकल के कई साहित्यकार व्यंग्य के नाम पर अपनी ही बिरादरी के साहित्यकारों का मजाक बनाते हैं। हिंदी के समाचार पत्र उन्हें छापते भी हैं। हो सकता है कुछ स्वयं घोषित साहित्यकार तुकबंदी परोस कर लोगोंको बोर करते हों, कुछ सम्मान की जुगाड़ में जोड़ तोड़ कर रहे हों, कुछ मंचासीन होने की जुगत में लगे हों पर मेरी सोच है कि साहित्य के लिये वे समय तो दे ही रहे हैं कोई चोरी तो नहीं कर रहे, डाका तो नहीं डाल रहे, गले की चेन तो नहीं झपट रहे, पैसे लेकर नेताओं की रेलियों की शोभा तो नहीं बढ़ा रहे, झूठे वादे तो नहीं कर रहे। साहित्य की किसी सभा में उपस्थिति का कोरम तो पूरा कर रहे हैं। ये वहां न हों तो कौन होगा। आजकल आसमान में कव्वे भी नहीं दिखते जो आकर कार्यक्रम को सफल बना देंगे।
पुस्तक के प्रथम अध्याय ‘मेरी प्यारी जन्मभूमि’ में उन्होंने न केवल गोगावां के भोगौलिक स्वरूप को चित्रित किया वरन अपने समय के असंख्य लोगों के नाम, काम, वेशभूषा, जाति, स्वभाव आदि का जीवंत विवरण देकर उन्हें इतिहास के पन्नों में दर्ज कर दिया। छब्बू सेठ, गोविंद सेठ, शोभाराम उंदरिया, अब्दुल, मंगूसा सेठ हरि ओम, गंगाराम, ओंकार लाल वैद्य, दाऊद जी टेलर, भास्कर बुआ शर्मा एक के बाद एक असंख्य नाम रंगमंच के पात्र की तरह अध्याय में अवतरित होते हैं ओर अपनी विशेषता की छाप छोडते चलते है। विश्वास ही नहीं होता कि कैसे कोई अपने बचपन के इतने नामों को उनकी विशेषताओं के साथ याद रख सकता है।
इनमें से एक पात्र का जिक्र करना चाहूंगा। वह है टुंडा दाजी चरवाहा। रंग काला, चेहरा डरावना, ऊंचाई छः फीट, हाथ के दोनों पंजे कटे हुए। बांस की एक पतली लाठी का एक सिरा वह बगल में तथा चौथाई सिरा कोहनी के बीच दबाकर वह अडवाट भागने वाले बेंडे पशुओं को काबू में रखता था। दोनों हाथों के पंजे ना होने पर भी वह कांटे दार मछलियां खा लेता था।
अपनी जन्मभूमि को कौतुकजी ने जिस वय में देख या समझ कर इस अध्याय में वर्णित किया उस वय के कितने लोगों को आज की दुनिया के किसी टुंडा दाजी की और ध्यान देने की फुरसत मिलेगी।
अध्याय के अंत में कौतुक जी ने एक ओर बड़ी बात कही कि गांव में बलाई जाति के लोगों को अछूत माना जाता था, उनका गावं के मध्य से आना मना था, घोड़ी पर बैठना मना था था पर गावं के सभी मंगल कार्यों में उन्हें बेंड बाजा बजाने की इजाजत थी। ऐसे अवसर पर ये बलाई अछूत क्यों नहीं माने जाते थे।
अपनी जन्मभूमि के बारे में इतना कुछ लिखकर उसके ऋण से जरूर ऊऋण हो गये सदाशिव कौतुक जी।
आगे जल्दी ही
महेंद्र सांघी ‘दद्दू’ ................
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें