मजदूर दिवस
मजदूर दिवस पर सभी मेहनतकश इंसानों के लिए तालियां। उन्हें गरीबी या अमीरी की तराजू में नहीं तोला जाना चाहिए। गरीब यदि अपने स्टेटस से खुश है, आत्मसम्मान से जी रहा है तो उसे बेचारा समझने का हमें क्या हक है। वह रोज कमाता रोज खाता है। नहीं मिलता तो आराम से भूखा सोकर फलाहार रहित सौ टका शुद्ध उपवास कर लेता है और कल की चिंता से दूर रात मीठी नींद सोता है। किसी को वजन उठवाना तो तो वह मजदूर की मिन्नत करता है कि उस काम को कर दे। बताइए उस वक्त बेचारा कौन हुआ।
दूसरी और अनेक अमीर हैं जो पूरे दिन मानसिक के साथ हाड़ तोड़ शारीरिक श्रम भी करते हैं वह भी अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए, देश के लिए, वे भी किसी मजदूर से कम नहीं। किसी कंपनी का वाइस प्रेसीडेंट पत्नी के आदेश पर यदि किचन में स्टूल पर खड़ा होकर ऊपरी केबिनेट से दाल का कनस्तर उतार रहा है तो वह भी तो उस पल मजदूरी ही तो कर रहा है।
स्त्री शक्ति तो मानो मजदूरी करने के लिए ही जन्म लेती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अपवाद को छोड़ दें जहां इनपर ज्यादतियां हुई, उन्होंने अपने इस स्टेटस के प्रति मन में असंतोष नहीं रखा और परिवार की गाड़ी का दूसरा पहिया बनी रहीं। समाज ने भी उन्हें आदर v सम्मान दिया। इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि मजदूरी को निम्न दर्जे का काम नहीं समझा जाता था।
अब स्थिति बदल रही है। मजदूर दिवस को छोड़कर मजदूर को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है। महिला शक्ति को गुमराह किया जा रहा है। उन्हें हर वह काम करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है जो पुरुष करते है। नतीजतन एक के बाद एक तलाक देखने को मिल रहे हैं, परिवार टूट बिखर रहे हैं। बूढ़े मां बाप अकेले तन्हाई में जिंदगी बिताने पर विवश हैं। इसके समर्थन में भी कई तर्क दिए जा सकते हैं। वह एक अलग लंबी चर्चा का विषय है।
मेरा मानना है की कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं या किसी दूसरे के लिए शारीरिक श्रम करता है तो हम उसे हेय नहीं प्रशंसा के भाव दे देखें।
अत में मजदूरी चाहे जिसकी कर लो पर अपने मन की कभी न करो। ऐसा न कि वह आपसे कुछ भी गलत सलत करने को कहता रहे और आप करते चले जाएं। हमेशा मन के मालिक बन कर रहें।
आज सभी को नमन।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें